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पानी के नीचे होने वाली गड़गड़ाहट से कैसे पहले से ही पता चल सकती है आने वाली ज्वालामुखी सुनामी की खबर? समझिए

 Written By: Vinay Trivedi
 Published : Sep 06, 2026 06:18 pm IST,  Updated : Sep 06, 2026 06:18 pm IST

वैज्ञानिकों ने इस बात का पता लगा लिया है कि कैसे पानी के नीचे होने वाली 'गड़गड़ाहट' ज्वालामुखी सुनामी को लेकर पहले से चेतावनी दे सकती है। इस आर्टिकल में जानिए वैज्ञानिकों ने इसके बारे में कैसे पता लगाया।

Underwater Volcano Warning- India TV Hindi
पानी के नीचे होने वाली 'गड़गड़ाहट' ज्वालामुखी सुनामी की पहले से दे सकती है चेतावनी। Image Source : AP (प्रतीकात्मक फोटो)

इंडोनेशिया में बीते शनिवार को अनाक क्राकाटोआ ज्वालामुखी फट गया और इसकी वजह से राख का गुबार करीब 50 हजार फीट तक ऊपर चला गया। इस बीच, एक शोध चर्चा में आ गया है कि कैसे पानी के नीचे होने वाली 'गड़गड़ाहट' के बारे में पता करके ज्वालामुखी सुनामी की चेतावनी को पहले से ही जाना सकता है। आइए वैज्ञानिकों के इस शोध के बारे में जानते हैं।

जब 50 किलोमीटर ऊपर तक पहुंच गई थी हुंगा ज्वालामुखी की राख

दरअसल, जनवरी, 2022 में टोंगा साम्राज्य के हुंगा ज्वालामुखी में हुआ भयानक विस्फोट पूरे विश्व के लिए अप्रत्याशित घटना थी। इस ब्लास्ट से राख और गैस का गुबार आसमान में 50 किलोमीटर से ज्यादा ऊंचाई तक पहुंच गया था। साथ ही, दबाव तरंगें पूरे विश्व में फैल गईं और इससे कई सुनामी लहरें पैदा हुई थीं।

एक तरह की नहीं थीं सुनामी की लहरों की वजहें

इस घटना ने टोंगा के कई भागों में बड़ी तबाही मचाई। इसमें कम से कम 3 लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन, इस घटना के बाद मिली सबसे अहम जानकारियों में से एक यह है कि इन सुनामी लहरों की वजह एक जैसी नहीं थी।

सुनामी में साउथ और सेंट्रल टोंगा के गांव हो गए थे बर्बाद

ब्लास्ट के शुरुआती फेज में हुए विशाल धमाकों से पहली सुनामी पैदा हो गई थी। हुंगा के पास टोंगाटापू आईलैंड पर कुछ ही मिनटों में 1 से 4 मीटर तक ऊंची लहरें पहुंची थीं। फिर, एक घंटे से ज्यादा समय बाद कुछ और विनाशकारी घटनाएं हुईं। हुंगा से 100 किलोमीटर की रेंज में मौजूद द्वीपों पर 18 से 40 मीटर तक की ऊंची सुनामी की लहरें पहुंचीं, जिन्होंने साउथ और सेंट्रल टोंगा के रिसॉर्ट और गांवों को बर्बाद कर दिया था। वहीं, 2025 में हवाई में मौजूद Kilauea ज्वालामुखी में विस्फोट हुआ था, तब 400 मीटर ऊंचाई तक राख उठी थी।

ज्वालामुखी के मुख्य गड्ढे के अचानक धंसने से आई थी सुनामी

हाल ही में द कन्वरसेशन में पब्लिश हुई रिसर्च से पता चला है कि यह बड़ी सुनामी किसी अन्य विस्फोट की वजह से नहीं, बल्कि ज्वालामुखी के कैल्डेरा यानी मुख्य गड्ढे के अचानक धंसने से उत्पन्न हुई थी। इस धंसाव से समंदर में ऐसी ध्वनि तरंगें पैदा हुईं, जिन्हें हजारों किलोमीटर दूर तक फील किया जा सकता था। यह रिसर्च धरती पर आने वाली कुछ सबसे अप्रत्याशित सुनामियों के बारे में लोगों को अलर्ट करने के एक नए तरीके की तरफ इशारा कर सकती है।

समंदर में ज्वालामुखी की निगरानी है मुश्किल

समुद्र के अंदर ज्वालामुखी की एक्टिविटीज को सुनना और उनपर निगरानी करना बहुत कठिन काम है। प्रशांत महासागर के रिंग ऑफ फायर इलाके में ऐसे सैकड़ों ज्वालामुखी हैं, लेकिन उनकी एक्टिविटीज और ब्लास्ट के वक्त प्रतिक्रिया देने के तरीकों के बारे में अभी जानकारी काफी सीमित है।

सैटेलाइट भी नहीं बता सकते सुनामी की भयावहता

सैटेलाइट भी गर्मी और गैसों के उत्सर्जन में परिवर्तन के साथ-साथ बादलों से विजिबिलिटी बाधित न होने पर ही विस्फोट से उठने वाले राख के गुबार का पता लगा सकते हैं। ये जानकारियां वक्त रहते ज्वालामुखी विस्फोट का अलर्ट देने और विमानों की सुरक्षा में सहायता कर सकती हैं। लेकिन सैटेलाइट यह नहीं बता सकते कि क्या उस जगह पर घातक सुनामी आने जा रही है।

ऐसे मिला समंदर में गतिविधियों को पता लगाने का संकेत

दूसरी तरफ, पारंपरिक भूकंप मापक यंत्र भी हर बार मददगार नहीं साबित होते। 2022 के विस्फोट के वक्त, हुंगा के सबसे पास मौजूद भूकंप मापक यंत्र फिजी में था, जो वहां से लगभग 750 किलोमीटर दूर था। इतनी दूरी पर ज्वालामुखी से जुड़ी कई भूकंपीय तरंगें धरती के भीतर से सही से प्रसारित नहीं हो पाती हैं। इसलिए इसकी जगह शोध के दौरान यह पता लगाने का प्रयास किया गया कि समंदर के भीतर हुंगा ज्वालामुखी की एक्टिविटीज क्या संकेत दे रही थीं।

जब घंटी की तरह काम करता है समुद्र तल से ऊपर उठा ज्वालामुखी

समंदर के अंदर ध्वनि और जल-ध्वनि संकेतों के तौर पर, जिनको तृतीयक तरंगें या टी-वेव कहते हैं, बहुत लंबी दूरी तक बहुत प्रभावी तरीके से यात्रा करती हैं। समुद्र के तल से ऊपर उठा हुआ कोई अलग-थलग ज्वालामुखी एक घंटी के जैसे काम कर सकता है, जो समुद्र में होने वाली हिंसक गतिविधियों की ध्वनियों को आसपास के समंदर में फैला देता है।

भूस्खलन के प्रवाह की आवाजों को सुन पाए वैज्ञानिक

शोध में दक्षिण-पश्चिम प्रशांत क्षेत्र के आसपास मौजूद 14 भूकंपीय केंद्रों के रिकॉर्ड का फिर से एनालिसिस किया गया। इनमें से कुछ केंद्र हुंगा ज्वालामुखी से 2 हजार 600 किलोमीटर तक दूर मौजूद थे। ब्लास्ट के पहले घंटे में वैज्ञानिक समुद्र के अंदर ज्वालामुखी की ढलानों से तेजी से नीचे खिसक रहे भूस्खलन के प्रवाह की आवाजों को 'सुन' पाए। ये प्रवाह इतने ताकतवर थे कि उन्होंने समंदर के अंदर बिछी संचार केबलों को भी नुकसान पहुंचाया। इनसे पैदा हुए ध्वनि संकेतों का पता सैकड़ों किलोमीटर दूर तक लगाया जा सका।

(इनपुट- भाषा)

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